“गोदी मीडिया” पर आलोचकों का आरोप यह है कि सत्ता के पक्ष में
“गोदी मीडिया” पर आलोचकों का आरोप यह है कि सत्ता के पक्ष में नैरेटिव गढ़ने के लिए अब सिर्फ स्टूडियो बहस ही नहीं, बल्कि डिजिटल automation, algorithmic amplification, bot networks, targeted messaging और data-driven प्रचार तकनीकों का भी इस्तेमाल हो सकता है। आलोचक कहते हैं कि तकनीक—चाहे AI हो, social media automation हो या coordinated IT cells—जनमत को प्रभावित करने का औज़ार बन सकती है।
लेकिन “IP address” को सीधे राजनीतिक प्रचार का सबूत मानना तकनीकी रूप से कमजोर तर्क है। IP address केवल नेटवर्क पहचान है; असली सवाल यह है कि:
* कौन narrative सेट कर रहा है
* कौन से accounts coordinated तरीके से amplify कर रहे हैं
* कौन misinformation या selective framing फैला रहा है
* किसके पास funding, reach और institutional backing है
आलोचनात्मक नज़रिए से देखें तो चिंता यह है कि तकनीक का उपयोग पारदर्शिता बढ़ाने के बजाय perception management के लिए हो सकता है—जहाँ खबर कम और agenda ज़्यादा दिखे। इसलिए ज़रूरी है कि दर्शक हर दावे को fact-check करें, multiple sources देखें, और मीडिया ownership व राजनीतिक proximity को समझें।



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