“मर्द क्यों थक जाता है?” मर्द थकता है… पर कह नहीं पाता, हर
“मर्द क्यों थक जाता है?”
मर्द थकता है… पर कह नहीं पाता,
हर रोज़ भीतर कुछ मरता है, पर रह नहीं पाता।
मुस्कान ओढ़े चलता है, जैसे कुछ भी नहीं,
पर सीने में तूफ़ान उठता है — किसी से कह नहीं।
ज़िम्मेदारियों की चादर ओढ़े, दिन-रात खटता है,
अपनों के लिए सब कुछ सहता है, फिर भी कम पड़ता है।
ना रोने की इजाज़त है, ना रुकने का हक़,
“तू मर्द है” — यही सुन-सुन के बनता है सख़्त।
सपने भी देखता है, पर उनके लिए वक़्त नहीं,
खुद को भूलकर सबके लिए जिए, ये कोई जंग नहीं?
कभी पिता, कभी बेटा, कभी साथी, कभी भाई,
हर किरदार में खो गया, खुद की तलाश अब भी अधूरी पाई।
थकता है क्योंकि…
उसे भी किसी का सहारा चाहिए,
कभी-कभी बस कहना चाहिए
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