शीर्षक: (कास्टिंग काउच)“ख़ामोशियाँ जो चीख़ती रहीं” वो सपना
शीर्षक: (कास्टिंग काउच)“ख़ामोशियाँ जो चीख़ती रहीं”
वो सपना लेकर आई थी,
आँखों में सितारे, होठों पर मुस्कान लिए।
चंद किरदार निभाने थे,
मगर खुद एक किरदार बन गई।
कहते थे, “तुममें हुनर है”,
पर हुनर की कीमत मांगी गई जिस्म से।
ऑडिशन के नाम पर
इंसानियत की बोली लगी।
“अगर आगे बढ़ना है…”
वो जुमला, जो सुनने में नर्म था,
पर दिल की दीवारों पर
ज़ख्म छोड़ गया गर्म था।
वो लड़की, जो किरदार में जान डाल सकती थी,
ख़ुद को ही नकाब में कैद पा गई।
आंसू पीती रही,
क्योंकि चीख़ने से काम नहीं मिलता।
बदनुमा हाथ जब सपनों को नोचते हैं,
तब एक कलाकार नहीं टूटता —
एक इंसान बिखर जाता है।
कास्टिंग काउच सिर्फ एक शब्द नहीं,
ये उन ज़ख्मों का नाम है
जो पर्दे के पीछे पलते हैं —
और पर्दा गिरने के बाद भी नहीं सूखते।



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