एक गुरु और शिष्य के बीच संवाद हुआ। शिष्य ने कहा, “गुरुजी, मे
एक गुरु और शिष्य के बीच संवाद हुआ। शिष्य ने कहा,
“गुरुजी, मेरे वस्त्र पुराने हो गए हैं, मुझे नए वस्त्र चाहिए।”
गुरु ने पूछा, “मैं तुम्हें नए वस्त्र तो दे दूँ, लेकिन पुराने वस्त्रों का क्या करोगे?”
शिष्य बोला, “गुरुजी, मैं पुराने वस्त्रों को बिस्तर से बदल दूँगा।”
गुरु ने फिर पूछा, “और जब बिस्तर भी पुराना हो जाएगा तो?”
शिष्य ने कहा, “उसे मैं दरवाज़े पर पर्दा बना लूँगा।”
गुरु ने फिर प्रश्न किया, “और जब पर्दा भी घिस जाएगा तब?”
शिष्य बोला, “तब मैं उसे पोछा बना लूँगा।”
गुरु मुस्कराए और बोले, “और जब पोछा भी बेकार हो जाएगा?”
शिष्य ने उत्तर दिया,
“तब मैं उसके सारे धागे निकाल लूँगा,
उनसे दीये की बाती बनाऊँगा,
और उस दीये से अपनी कुटिया को प्रकाशमान करूँगा।”
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🌼 शिक्षा / भावार्थ
इस कथा का संदेश है कि ज्ञानी व्यक्ति किसी भी वस्तु या परिस्थिति को व्यर्थ नहीं जाने देता।
वह हर चीज़ का सदुपयोग करता है और अंततः प्रकाश (ज्ञान, चेतना, उपयोगिता) उत्पन्न करता है।
यह कहानी संसाधनों का सम्मान, विवेक और रचनात्मक सोच सिखाती है।



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